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शक्ति उपासना का सर्वश्रेष्ठ रूप श्रीविद्योपासना
श्रीविद्या, जो मन्त्रों में मातृका, शब्दों में ज्ञान, ज्ञानों में चिन्मयातीता एवं शून्यों में शून्यसाक्षिणी है। “देव्युपनिषद्” में कहा भी गया है-मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ।।

संकेत-त्रयान्तर्गत मन्त्र संकेत
संकेत-त्रय में सबसे महत्वपूर्ण मन्त्र संकेत है। देवता का बोध मन्त्र द्वारा होता है। अतएव देवता वाच्य है एवं मन्त्र उसका वाचक है। वाच्य वाचक शब्दों को ही अभिधान, अभिधेय, नाम-नामी पर्याय के द्वारा व्यवहृत किया जाता है। वाच्य और वाचक में अभेद सम्बन्ध शास्त्र में प्रतिपादित है। ‘वाक्यप्रदीप’ में भतृहरि ने कहा है-.....

संकेत-त्रयान्तर्गत पूजा संकेत
पूरा तन्त्र, विशेष कर श्री-चक्र पूजा तो पूरा का पूरा ही संकेतात्मक है। शैव एवं शाक्त सम्प्रदायों का विकास श्रीचक्र, मन्त्र एवं पूजा विधान पर ही आश्रित है। वेदान्तिक पूजा में भी उपर्युक्त संकेत-त्रय(चक्र, मन्त्र और पूजा) का आश्रय लिया गया है। आज हम चर्चा करेगें पूजा-संकेत पर। तन्त्र में पूजा के सर्वश्रेष्ठ रूप को परा-पूजा के नाम से संकेत किया जाता है। इसकी सर्वश्रेष्ठता का कारण यह है कि इस प्रकार की पूजा से परम शिव के अद्वैत ज्ञान का स्रोत प्रवाहित होने लग जाता है।





