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तन्त्र साधना में शुद्धि निरूपण
वैदिक साधना में बाह्य शरीर आदि की शुद्धि पर विशेष आग्रह है अतः शुद्धि निरूपण विषय पर लिख रहा हूँ । कालान्तर में बाह्य शुद्धि ही साधना का मुख्य अङ्ग बन गई तथा अन्ततोगत्त्वा बाह्य शुद्धि ने ही साधना का रूप धारण कर लिया एवं अस्पर्शता को वर्ण-व्यवस्था का धर्म स्वीकार कर लिया गया एवं जाति भेद ने समाज में उच्च एवं नीच की भावना को प्रोत्साहित किया । साधक स्नान, तिलक, चन्दन, भस्म लेपन आदि......
|by KAULBHASKAR GURU JI