षट्-त्रिंशत तत्व का उपदेश महानारायणोपनिषद् , नारद परिव्राजकोपनिषद् में दिया गया है जिन्हें शुद्ध, शुद्धाशुद्ध तथा अशुद्ध कोटि में विभक्त किया गया है –
“शक्तिः साक्षान्महादेवी महादेवस्तु शक्तिमान,
तयोर्विभूतिलेशो वै सर्वमेतच्चराचरम् ।
वस्तु किंचिद् चिद्रूपं किंचित्वस्तु चिदात्मकम् ,
इदं शुद्धमशुद्धं च परं चापरमेव च ।
यत् संसरति चिच्चक्रमचिच्चक्रसमन्वितम् ,
तदेवा शुद्धमपरिमितरं तु परं शुभम् ।
अपरंच परं चैव द्वयं चिद्चिदात्मकम् ,
शिवस्य शिवायाश्च स्वात्म्यं चैत स्वभावतः ।
यथा शिवस्तथा देवी यथा देवी तथा शिवः,
नानयोरन्तरं विद्याच्चन्द्र चन्द्रिकयोरिव ।”
अर्थात् शक्ति साक्षात् महादेवी है और महादेव शिव ही शक्तिमान हैं । इन दोनों के विभूति अंश से ही यह चराचर सारा जगत् । कोई वस्तु चेतन है तो कोई अचेतन । इन्ही दोनों तत्वों को जीव-जड़ एवं शुद्ध अशुद्ध कहते हैं । पर और अपर भी इन्ही दोनों की संज्ञा है । अचिद् चक्र के साथ चिद् (जीव)संसार का अनुभव कर रहा है-इसे ही अशुद्ध कहते हैं । इनसे भिन्न शुद्ध है । चिद् अचिद् इन तत्वों पर शिव एवं शिवा का अधिकार है । जैसे शिव हैं वैसे हीं शक्ति है इन दोनों की एकता चन्द्र और चंद्रिका की तरह है । शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर और शुद्ध विद्या तत्व शुद्ध कहे जाते हैं । माया, कला, विद्या, राग, काल, नियति और पुरुष ये तत्व शुद्धाशुद्ध कहे जाते हैं । शेष प्रकृति से लेकर पृथ्वी पर्यंत चौबीस तत्व जिनका वर्णन सांख्य शास्त्र में किया गया है, उसे अशुद्ध तत्व कहते हैं ।
सच्चिदानन्द ब्रह्म से आविर्भूत शिव से लेकर पृथ्वी पर्यंत ३६ तत्वों का स्वरूप इस प्रकार है-
शिव और शक्ति तत्व में आनन्द अंश पूर्ण रूप से है । सदाशिव तत्व से लेकर विद्या तत्व तक चिदंश अनावृत रूप से है । माया से लेकर पृथ्वी पर्यंत सदंश व्यक्त है । परतत्व में सच्चिदानन्द तीनों समान रूप से व्यक्त है । आत्मा शब्द सत्ता का बताने वाला है, विद्या शब्द ज्ञान का और शिव शब्द आनन्द का बताने वाला है ।
नटनानन्द ने कामकला विलास की टीका में तत्व का लक्षण इस प्रकार बताया है-
‘आप्रलयं यतिष्ठति सर्वेषां भोग दायिभूताणम् ।
तत्तत्वमिति प्रोक्तं न शरीर घटादि तत्वमतः।।’
अर्थात् प्रलय पर्यंत सभी भूतों को जो भोग प्रदान करता है उसे तत्व कहते हैं । शरीर घटादि का नाम तत्व नहीं है ।
